jaovaNaat hI kZI AXaIca rahU do BaoTIt ]YNata maÜzI 
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LOL Vikas...!! Roj kaay kadhich asate ka jevnaat aata ? maase-macchi naste ka ? 
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Kandapohe
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| Monday, December 12, 2005 - 4:58 am: |
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काल अनेक दिवसांनी चलती का नाम गाडी बघीतला. बाजू SSSS बाबू समझो इशारे हौरन पुकारे पम पम पम यहां चलती को गाडी कहते हैं प्यारे पम पम पम यातील हौरन मी अनेक वर्ष फ़ोरन पुकारे म्हणत असे. आणखी एक गाणे. घनश्याम सुंदरा... यातील करूनी सडा संमार्जन मला नेहेमी करूनी संडास मार्जन... ऐकु येत असे. 
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Manuswini
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| Monday, December 12, 2005 - 9:47 pm: |
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मी तरि अजुन हेच समजत होते संडासमार्जन कारण logically सकाळी सकाळी काय तेच करतात ना आणी दुसरं म्हणजे मी मार्जन म्हणजे हीदीतील मन्जन्(दात मन्जन्) समज करुन मला मराठित ते मार्जन आहे असे वाटायचे पुर्ण गण्याचा अर्थ हा मी असा केला की कृष्ण सकाळी दात संडास, अन्घोल वगैरे सगळ करुन तयार झाला पुजेसाठी अर्थात मी लहन असतानाची गोश्ट्ट आहे ही आणी तो समज कयम अजुन होता भेटीत दुष्ट्ता मोठी असे वाटायचे
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Manuswini
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| Monday, December 12, 2005 - 9:57 pm: |
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विकास भेटीत उष्ण्ता का मोठी एक. भा. प्र.
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Dakshina
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| Thursday, December 15, 2005 - 7:02 am: |
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माझ्या मैत्रिणीचा भाचा कहो न प्यार हैं मधल एक पल का जिना.. असं म्हणायचा. एक पल का जिना... फ़िर तो क्या जाना तौबा क्या लेके जाईये दिल लेके आना... खाली हाथ आने को.. खै हात बताने को अस मरने को है रे बाबा..
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Kandapohe
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| Thursday, December 15, 2005 - 7:54 am: |
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एक आणखी गाणे. तेरे घर के सामने मधले. ये तनहाई, हाय रे हाय जाने फ़िर आये ना आये थाम लो बाहे, थाम लो बाहे थांबलो बाहेर, थांबलो बाहेर!!
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Pama
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| Thursday, December 15, 2005 - 3:46 pm: |
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काल वैजयंतीमाला ची गण्यांची VCD बघत होते तेव्हा हे आठवल एकदम.. उडे जब जब जुल्हे तेरी.. या गाण्यात एक ओळ आहे.. तेरे गाव के सुवर(?) के भी सदके.. नक्की काय अजून माहीत नाही
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Chinnu
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| Thursday, December 15, 2005 - 11:10 pm: |
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पमा, मला पण तसच ऐकायला यायचे आणि वरकडी म्हणजे मला ते पटते पण. तुच पहा- उस गांव के सुवर के भी सदके उस गांव के सुवर के भी सदके के जहा मेरा यार बसता के जहा मेरा यार बसता, जिन्द मेरिये..! KP , तु किती वेळ बाहेर थांबुन गाणे गात होतास? दिवे घे रे..
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Dakshina
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| Friday, December 16, 2005 - 4:36 am: |
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पमा आणि चिन्नू, अगं आपल्याकडे म्हण आहे ना? माहेरचं कुत्रं...पण प्रिय असतं तसंच आहे हे.. कि तुझ्या गावचं डुक्कर पण मला प्रिय आहे, कारण ते तुझ्या गावचं आहे.
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Gandhar
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| Friday, December 16, 2005 - 6:15 am: |
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मंगेशाण्णांनी लिहिलेले आणि शोभा जोशी यांनी गायलेले एक गाणे - जरी या पुसून गेल्या, सार्या जुन्या खुणा रे हा चंद्र पाहतांना होते तुझी पुन्हा रे हे गाणं मला असं वाटायचं - दरीया पुसून गेला, सार्या जुन्या खुणा रे हा चंद्र पाहतांना होते तुझी पुन्हा रे
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आप जैसा कोई जिन्दगीमे आये और बाप बन जाये
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Moodi
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| Friday, December 16, 2005 - 12:11 pm: |
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हे गाणे तर मला कायम असे ऐकु यायचे आला आला वारा संगे पावसाच्या धारा पाठवणी करा सार्या निघाल्या सासु सुना ते सया निघाल्या सासुरा असे आहे हे मला नंतर कळले.
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Pama
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| Friday, December 16, 2005 - 7:57 pm: |
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दक्षिणा म्हणजे ते खरच'सुवर' आहे का? म्हणजे मी चुकीच एकलच नाही तर..
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Manuswini
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| Friday, December 16, 2005 - 9:56 pm: |
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मी हे असच म्हणायचे आप जैसा कोई मेरे जिदगी मे आये और बाप बन जाये
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Paragkan
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| Friday, December 16, 2005 - 9:59 pm: |
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Gandhar: ditto 
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Manuswini
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| Friday, December 16, 2005 - 10:00 pm: |
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मी रात टाकली मधिले एक line आहे न त्याचा अर्थ मला अलिकडे कळला का अजुन नक्की काय ते माहित नाही पिवळ्या पानत पिवळ्या पानत काबळ काबळ नाचती भर ज्वानी तली नार अन्ग भरुन नाचती ते काय आहे actually ज्वानी का जवानी कबळ म्हणजे काय
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Gandhar
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| Saturday, December 17, 2005 - 4:48 am: |
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Manuswini, बरोबर ओळी अशा आहेत - हिरव्या पानांत हिरव्या पानांत सावळ सावर चालती भर ज्वानीतली नारं अंग मोडीत चालती.. *** पूर्ण गाणं असं आहे मी रात टाकली, मी कात टाकली मी मुडत्या संसाराची बाई लाज टाकली हिरव्या पानांत हिरव्या पानांत सावळ सावर चालती भर ज्वानीतली नारं अंग मोडीत चालती ह्या पंखावरती मी नभ पांघरती मी मुक्त मोरनी बाई चांदन्यात न्हाती अंगात माझीया भिनलाय ढोलीया मी भिंगर्भिवरी त्याची गो मालन झाली मी बाजिंदी मनमानी बाई फुलांत न्हाली गीतकार : ना. धो. महानोर संगीतकार : हृदयनाथ मंगेशकर गायिका : लता मंगेशकर
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Anilbhai
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| Monday, December 19, 2005 - 1:01 pm: |
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आता तुम्ही विचारलत म्हणुन सांगतो.. खर गाण अस आहे हे मला फ़ार उशीरा कळल.. सुकांत चंद्रानना पातली भुवरी सरसावुनी.. ह्या गाण्यातल्या मधल्या ' त ' चा नेहमीच द' व्हायचा. आणी मग त्या चंद्रानने ने भुमंडळावर काय अनर्थ घडवला असेल त्याचा विचार करुन आम्ही हसुन हसुन गडबडा लोळायचो
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Moodi
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| Monday, December 19, 2005 - 1:12 pm: |
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अनिलभाई कमाल केलीत तुम्ही.. 
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Priya
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| Monday, December 19, 2005 - 2:41 pm: |
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भाई, ते भृधनु सरसावुनी आहे हो...
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Anilbhai
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| Monday, December 19, 2005 - 3:29 pm: |
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चला म्हणजे अजुनही चुकतोच आहे 
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Manuswini
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| Monday, December 19, 2005 - 9:31 pm: |
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भाई हसुन पुरेवाट झाली हो त चा द झाल्याने पण ही खुप फरक होतो ते कळल. ध चा मा एकल होत
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Manuswini
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| Monday, December 19, 2005 - 9:33 pm: |
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गंधार thanks पण गाण्याचा अर्थ नाही सागितलास असो
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Bee
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| Tuesday, December 20, 2005 - 7:21 am: |
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manauÊ हिरव्या पानांत हिरव्या पानांत सावळ सावर चालती भर ज्वानीतली नारं अंग मोडीत चालती.. (a AÜLIt saavaL saavar malaa naahI kLlao pNa trIhI ihrvyaa JaaDItUna eona t$Na vayaat p`vaoXa kolaolyaa
pÜrI AMga maÜDUna Aqaa- vaakUna caalat Aahot.. karNa JaaDI daD hÜ}na vaaklyaa Asaavyaat. मला ह्या बाजिंदीचा अर्थ नाही कळला.. मी बाजिंदी मनमानी बाई फुलांत न्हाली
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बाजिंदी हा शब्द आमच्याकडे बिनडोक, दोन द्यायची पण आणि घ्यायची पण धमक असलेला / ली अशा अर्थाने वापरतात.
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Bee
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| Tuesday, December 20, 2005 - 8:10 am: |
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thanks Gajanan.. u seems to be perfect! bindhast hya arthee ithe waparala asawa.
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Pinaz
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| Tuesday, December 20, 2005 - 8:24 am: |
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baIÊ maaÔ kraÊ pNa AMga maÜDIt caalaNao mhNajao vaakUna caalaNao naahI. AMgaalaa lacako dot caalato AahoÊ
Asaa %yaacaa Aqa- Aaho. [qao gaaNyaat XaRMgaairk Baava Aalaolaa Aaho. %yaa dRYTInao phavao. ipnaaJa
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Bee
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| Tuesday, December 20, 2005 - 8:38 am: |
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U r right Pinaz! 'अंगाला लचके देत चालणे' अधिक योग्य शब्द वापरलेत तुम्ही. मी पहिल्या दोन ओळींचा शृंगारीकच भाव लक्षात घेतला आहे. पण नंतरच्या कडव्यातील ओळी खूप अर्थवाही आहेत, शृंगारीक नाहीत. हे संपूर्ण गाणे एकच भाव प्रगट करत नाही. विविध भाव एकाच गाण्यात गुंफले गेले आहेत. पर्जन्याच्या कवितांसाठी रा. धो. महानोर प्रसिद्धच आहे. 'जैत रे जैत' ह्या चित्रपटातील नायिका स्मिता पाटिल जेंव्हा आपल्या पहिल्या पतीसोबत काडीमोड घेते तेंव्हा तिला त्याचे काही दुःख वाटत नाही. कारण लग्न करून मिळणार संसारातल सुख, नवर्याची प्रेमळ सोबत हे तिला काहीच लाभत नाही. म्हणून ती म्हणते आहे मी रात टाकली, मी कात टाकली, मी मुडक्या संसाराची, बाई लाज टाकली' अर्थात मी माझ्या आत्तापर्यंतच्या जीवनातील काळोख बाजूला सारून एक नवा जन्म घेते आहे.. कात टाकते आहे.. जे मोडक होत ते विसरून पुढे जाते आहे. मला कुणाचीच तमा नाही. भले मला हा समाज निर्लज्ज म्हणेल तरी मी बेधुंद जीवन जगणार आहे.
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Manuswini
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| Tuesday, December 20, 2005 - 7:03 pm: |
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thanks to all who took efforts to explain :-)
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Sas
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| Tuesday, December 20, 2005 - 9:56 pm: |
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देवदास च सिलसीला ये चाहत का हे गाण पहील्यांदा एकतांना मी "ये हवा ये बिजलीया" हे "ये हवा ये तितलीया" अस एकलेल. मला प्रश्न पडला "पावसाच्या वर्णणात "तितली" का, कुठुन आणी कशी आली.
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Sas
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| Tuesday, December 20, 2005 - 10:09 pm: |
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मी लहानपणी एक गाण म्हणायचे, "राम तेरी गंगा मेली हो गई पापीयोके पाप धोते धोते रोटी से बचकर अगर निकल जाये कोई तो उसका दुनियामे बडा नाम है, पापी पेट का सवाल है सबका एक जैसा हाल है" अस गाण आहे का खरच? anybody know abt it?
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Dakshina
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| Thursday, December 22, 2005 - 8:32 am: |
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सास, मला वाटतं की तू २ गाणी एकत्रं केली आहेस.
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Dakshina
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| Thursday, December 22, 2005 - 8:35 am: |
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तो नविन गायक कोण आहे..? जो नाकातून गातो.... नाशिक बनाया नाशिक बनाया नाशिक बनाया आपने........
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दक्षिणा, ... ... ...
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